बिलासपुर 18 दिसम्बर 2025 (नवचेतना न्यूज छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत भरण-पोषण के संबंध में एक स्पष्ट निर्णय दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी के अवैध संबंध साबित होते हैं, तो वह पति से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने फैमिली कोर्ट के 2009 के निर्णय को सही ठहराते हुए पत्नी की अपील को खारिज कर दिया। इस मामले में दोनों पक्षों की पहचान को गोपनीय रखा गया है।
शादी का इतिहास 1975 में हुई थी शादी:
जानकारी के अनुसार, पति-पत्नी की शादी 1975 में हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। इस विवाह से उनके चार बच्चे हुए। प्रारंभ में सब कुछ सामान्य था, लेकिन बाद में दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने उसके साथ मारपीट की और 17 अप्रैल 2001 को उसे घर से निकाल दिया। इसके बाद वह अपने भाई के घर रहने लगी।
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पत्नी ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा:
पत्नी ने कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई कि पति ने उसके गहने रख लिए हैं और भरण-पोषण देने से मना कर दिया है। उसने यह भी कहा कि पति के पास लगभग 10 एकड़ भूमि है और उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी है, इसलिए उसने नियमित भरण-पोषण की मांग की।
पति ने अवैध संबंध का किया खुलासा:
सुनवाई के दौरान पति ने सभी आरोपों को निराधार बताया और पत्नी पर अवैध संबंध का गंभीर आरोप लगाया। उसने कहा कि 15 अप्रैल को उसने पत्नी को किसी अन्य व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखा। इस घटना के बाद पंचायत में पत्नी ने अपने अवैध संबंध को स्वीकार किया।
फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया:
कोर्ट ने पति, बेटे और अन्य गवाहों के बयान और पंचायतनामा को आधार बनाते हुए पत्नी के अनुचित आचरण की पुष्टि की। इसी आधार पर फैमिली कोर्ट के 31 अक्टूबर 2009 के निर्णय को सही ठहराया गया। कोर्ट ने कहा कि अवैध संबंधों के मामलों में भरण-पोषण का अधिकार नहीं होता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अवैध संबंध सामान्यतः गोपनीय होते हैं, लेकिन उन्हें परिस्थितियों के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है। यदि पत्नी अशुद्ध आचरण में लिप्त पाई जाती है, तो उसे पति से अलग निवास और भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिलता।

